बीकानेर संभाग का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल PBM Hospital कभी आम जनता के लिए उम्मीद का केंद्र माना जाता था। दूर-दराज़ गांवों और छोटे कस्बों से गरीब और मध्यम वर्गीय मरीज इस भरोसे के साथ यहां आते हैं कि सरकारी अस्पताल में उन्हें सस्ती और बेहतर चिकित्सा सुविधा मिलेगी। लेकिन आज कई लोगों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है — आखिर इस व्यवस्था से ज्यादा लाभ किसे मिल रहा है, मरीजों को या फिर कुछ डॉक्टरों और उनसे जुड़े निजी कारोबारों को?
चिकित्सा पेशा हमेशा सेवा, संवेदना और मानवता का प्रतीक माना गया है। डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है क्योंकि वह जीवन बचाने का कार्य करता है। लेकिन जब इसी सेवा भाव की जगह व्यापारिक मानसिकता हावी होने लगे, तब जनता का भरोसा टूटने लगता है। पिछले कुछ वर्षों में लगातार ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं कि कुछ डॉक्टरों ने अपने घरों या घर के आसपास मेडिकल स्टोर, लैब और अन्य निजी स्वास्थ्य सेवाओं का नेटवर्क खड़ा कर रखा है। मरीजों को सरकारी अस्पताल से जांच या दवाइयों के नाम पर निजी संस्थानों की ओर भेजे जाने की चर्चाएं आम हो चुकी हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि गरीब मरीज, जो सरकारी अस्पताल में मुफ्त या कम खर्च में इलाज की उम्मीद लेकर आता है, वही आर्थिक बोझ के नीचे दबता चला जाता है। कई मरीज बताते हैं कि अस्पताल में सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें बाहर की लैब में जांच कराने की सलाह दी जाती है। कोई निजी मेडिकल स्टोर से दवा लेने को कहता है तो कोई विशेष जांच केंद्र का नाम लिख देता है। सवाल यह है कि यदि सरकारी अस्पताल में मशीनें, लैब और दवाइयां उपलब्ध हैं, तो फिर मरीजों को बाहर क्यों भेजा जा रहा है?
जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि कुछ लोगों के लिए चिकित्सा सेवा अब “सेवा” नहीं बल्कि “धंधा” बनती जा रही है। डॉक्टर का पेशा जहां कभी त्याग और समर्पण का प्रतीक था, वहीं अब उस पर व्यवसायिकता का आरोप लगने लगा है। यह स्थिति केवल आर्थिक शोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो रही है।
हालांकि यह भी सच है कि हर डॉक्टर को एक नजर से देखना गलत होगा। आज भी कई डॉक्टर ऐसे हैं जो पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ मरीजों की सेवा कर रहे हैं। दिन-रात मेहनत कर गरीबों का इलाज करने वाले चिकित्सकों की कमी नहीं है। लेकिन कुछ लोगों की कथित गतिविधियां पूरे चिकित्सा जगत की छवि खराब कर देती हैं।
जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच करे। यदि कोई डॉक्टर सरकारी पद पर रहते हुए नियमों के विरुद्ध निजी लाभ से जुड़ी गतिविधियों में शामिल है, तो उस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अस्पतालों में पारदर्शिता बढ़े, मरीजों को उपलब्ध सुविधाओं की स्पष्ट जानकारी मिले और बाहरी रेफरल की निगरानी हो — तभी जनता का भरोसा दोबारा मजबूत हो सकेगा।
सरकारी अस्पताल केवल इमारतें नहीं होते, वे आम जनता की उम्मीदों का केंद्र होते हैं। यदि वहां भी मरीज खुद को असहाय और आर्थिक रूप से शोषित महसूस करने लगे, तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। चिकित्सा सेवा का मूल उद्देश्य मानव सेवा है, और जब तक यह भावना सर्वोपरि नहीं रहेगी, तब तक व्यवस्था पर उठते सवाल खत्म नहीं होंगे।

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