चुनाव कोई भी जीते… सवाल सिर्फ एक है—क्या इस बार जनता भी जीतेगी?


 सभी पार्टियां अपनी-अपनी गणित और चुनावी समीकरण बैठाने में लगे हैं।

कहीं टिकट की जोड़-तोड़ है, कहीं समर्थकों को साधने की कोशिश, तो कहीं बड़े-बड़े चुनावी वादों की बाढ़ आई हुई है। हर कोई अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए मैदान में पूरी ताकत से जुटा हुआ है।

शहर के कई बड़े नाम मेयर बनने की उम्मीद और महत्वाकांक्षा के साथ चुनावी मैदान में हैं। प्रचार तेज होगा, दावे बड़े होंगे और जनता के सामने विकास के अनेक वादे किए जाएंगे। कोई शहर को बदलने की बात करेगा तो कोई वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान करने का भरोसा दिलाएगा।

लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल आम जनता के मन में है—

जीत चाहे किसी की भी हो, आखिर जनता को क्या मिलेगा?

क्या शहर की टूटी सड़कें सुधरेंगी?
क्या सफाई व्यवस्था बेहतर होगी?
क्या पानी, बिजली और यातायात जैसी मूलभूत समस्याओं का समाधान होगा?
क्या आम नागरिकों की शिकायतों को वास्तव में सुना जाएगा?
क्या विकास केवल चुनावी मंचों और भाषणों तक सीमित रहेगा या जमीन पर भी दिखाई देगा?

आज चुनाव लड़ने वालों की अपनी-अपनी रणनीति है, अपने समर्थक हैं और अपने राजनीतिक समीकरण हैं। लेकिन जनता का समीकरण बहुत सीधा है—

जिसे भी जिम्मेदारी मिले, उसे शहर और जनता के हित में काम करना होगा।

क्योंकि चुनाव जीतना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जनता का विश्वास जीतना और उस पर खरा उतरना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

चेहरे बदल सकते हैं, पद बदल सकते हैं, सत्ता बदल सकती है… लेकिन जनता की उम्मीद नहीं बदलती।

अब देखना यह है कि चुनावी वादों की इस भीड़ में जनता के असली मुद्दों को कौन समझता है और जीत के बाद उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी कौन निभाता है।

आखिरकार सवाल सिर्फ यह नहीं कि मेयर कौन बनेगा… सवाल यह है कि जनता के लिए कौन काम करेगा।


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